नेता और जनता

भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति का मोल चुका रही है जनता ।
अपने चुनिंदा लोगों के सामने कत्थक कर रही है जनता।।
भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति का मोल चुका रही है जनता ।
अब तो भोली जनता समझो ।
यह नेता तुम्हारे सखा नहीं ।।
वोट तुम्हारे लेकर बने नेता ।
तुम्हारी पीठ पर खंजर भौकता नेता।।
भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति का मोल चुका रही है जनता ।
तुम्हें आपस में लड़ा कर।
राज कर रहे हैं नेता।।
जब तुम भूख से रोते बिलखते हो ।।
दावत उड़ा रहे हैं नेता ।
भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति का मोल चुका रही है जनता ।।
कैसा देश ,कैसा देश प्रेम ,
इनका मजहब है कुर्सी ।
इस कुर्सी के खातिर अपना ईमान बेचता नेता।।
भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति का मोल चुका रही है जनता ।
अपनी पार्टी को मजबूत करने में।
देश को खोखला करता नेता ।।
सफेदपोश में रहता है ।
खटमल से भी बदतर नेता।।
भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति मोल चुका रही है जनता ।
जब बहुमत ना मिले ।
मध्यावधि चुनाव का ढोल पीटते नेता ।।
महंगाई की दास गरीबी ।
जनता को कर्ज में डुबौता नेता ।
भ्रष्ट लोगों की भ्रष्ट राजनीति का मोल चुका रही है जनता ।।
भ्रष्ट नेता सुन लो बात ।
अब ना चलेगा भ्रष्टाचार ।।
जनता अब समझ चुकी है ।
नोट और वोट की भाषा भूल चुकी है ।।
करेगा सेवा जो देश की वहीं बनेगा नेता ।
नहीं तो आड़े हाथ लेगी अब चुनाव में नेता को जनता
लेखक और कवि
विमल कुमार पंचाल

किसके लिये दर्द के आंसू बहाता है

तू किसके लिए दर्द के आंसू बहता है ।
इस बेखबर जहां में किसे तु पुकारता है।।

कोई नहीं है ,तेरा इस खुदगर्ज दुनिया में ।
अकेला है, अकेला ही रहेगा ,इस चमन के वीराने में ।।

मगर तू आज ,किसके लिए दर्द के आंसू बहाता है ।

दोस्ताना किया है अगर, तूने उसे निभाया है ।
दोस्ती के कफन से ,अपने प्यार को सजाया है ।।

कौन है जो, तेरे लिए दो आंसू बहा दे
तू कहे उनसे ,यार का जनाजा है थोड़ा मुस्कुरा दे ।।

क्यों रखता है तो ,इस जमी आसमां की खबर ।
आज तो वह भी है ,अपनों से बेखबर ।।

कोई उम्मीद ना रखना, इस जमाने से ।
चाहत की राहें ,और मंजिल के सो अफसानो से ।।

तकदीर में जो लिखा है ,वही होता है ।
जमाना चाहे कुछ कहे कुदरत रस्म निभाता है ।।

मगर तू आज किसके लिए दर्द के आंसू बहाता है।

लेखक व कवि

विमल कुमार पंचाल

बंदर और इंसान

एक बार की बात है एक धार्मिक प्रवास मथुरा जा रहा था | जिसमें एक वृद्ध पति पत्नी सफर कर रहे थे | वे जब मथुरा पहुंचे व कृष्ण के मंदिर मैं दर्शन करके बाहर आए और वह एक पेड़ के नीचे खड़े थे तभी एक बंदर ने वृद्ध पति के चश्मे को उनकी आंख से उतार कर अपने हाथ में लेकर पेड़ के ऊपर बैठ गया | मैं यह सारा दृश्य अपनी आंखों से देख रहा था | वृद्ध पति पत्नी उस बंदर को देखते रह गए | वह लाचार हो गए क्योंकि चश्मा उस वृद्ध पति की आँखें था | उन्हें देखने में कठिनाई हो रही थी | वह बंदर की तरफ़ गुस्से से देख रहे थे | जैसे इनका कोई अमूल्य खजाना चुरा लिया हो | और बंदर उस चश्मे को कभी अपनी आंखों पर लगाता और कभी अपने हाथों में खेलता वह उसे इस तरह से देखता जैसे उसे कोई खजाना मिल गया हो |और ऐसा लग रहा था जैसे उस वृद्ध व्यक्ति को चिड़ा रहा हो | वृद्ध व्यक्ति गुस्से से लाल पीला हो रहा था और उसने जमीन पर पड़े हुए पत्थर को उठायाऔर बंदर की तरफ निशाना साधने लगा | तभी वहां से एक राहगीर गुजर रहा था | उसने पूछा क्या बात है | आप बंदर को पत्थर क्यों मार रहे हैं | यह तो हमारे साक्षात हनुमानजी है |आप इस धर्म नगरी में भगवान का अपमान कर रहे हैं | मैं बेबस हो कर राहगीर को अपना दुखड़ा सुना ने लगा | उसने कहा मैं आपके चश्मे वापस ला सकता हूं लेकिन मेरी एक शर्त है मैं इस काम का ₹50 लूंगा मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूं और मैं लाचार था | मुझे अपनी आंखों से कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा था | मैंने उसकी बात स्वीकार कर ली कि अगर आप उस बंदर से मेरा चश्मा वापस ला देते हैं तो मैं आपको ₹50 दूंगा |राहगीर ने अपने बैग से 2 गेंदे निकाली और वह अपने दोनों हाथों से एक के बाद एक बारी बारी से बंदर की तरफ उछालने लगा मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या नाटक कर रहा है | लेकिन तभी बंदर ने राहगीर को देखा और वह गेंद पकड़ने के लिए छलांग लगाई तभी उसके हाथ से चश्मा छूट गया व जमीन की तरफ़ आने लगा तभी राहगीर ने एक अच्छे क्रिकेटर की तरह उसे अपनी हथेलियों में कैच कर लिया | व चश्मा वृद्ध व्यक्ति को दे दिया उसकी एवज में उसे उपहार के रूप में ₹50 मिले | वृद्ध व्यक्ति तो झूम उठा | जैसे उसे अपनी खोई हुई आंखें मिली गई हो |उसे जरा भी गम नहीं था उन ₹50 का जो उसने उस राहगीर को दिए थे | राहगीर अपने रस्ते चला गया लेकिन मेरे दिमाग में कई प्रश्न छोड़ कर गया कहीं ऐसा तो नहीं बंदर और उस राहगीर ने मिलकर उस वृद्ध व्यक्ति को मूर्ख बनाया हो और यह बंदर उस राहगीर का तो नहीं था| यह बंदर और राहगीर दोनों मिलकर इसी तरह पर्यटको को बेवकूफ बनाते हो |और यह उनकी कमाई का जरिया हो| ऐसे कई प्रश्न मेरे दिमाग में उठते रहे तभी बस के कंडक्टर ने आवाज लगाई सभी यात्री बस में अपनी अपनी जगह पर बैठ जाएं | और वृद्ध पति पत्नी भी उस बस में जाकर बैठ गए| मैं भी उसी बस में सफर कर रहा था और सौभाग्य से उनकी पिछली सीट पर बैठा था मैं उनकी सारी बातें सुन रहा था | पत्नी कह रही थी चलो छोड़ो यह क्या कम है कि आपके चश्मे वापस आ गए नहीं तो हमें नए चश्मे बनवाने पडते और उसकी लागत ₹50 से कई गुना अधिक होती |ईश्वर का शुक्र है | हमें अपने चश्मे वापस मिल गए | मुझे उनकी पत्नी की इस मासूमियत पर हंसी आई और मैं अपने आप पर हंसने लगा कि हम कितने खुदगर्ज इंसान हैं |कोई हमारी मदद करता है हम उसे भी शक की निगाहों से देखते हैं |तब मुझे वह जाता हुआ राहगीर एक सच्चा मददगार था | जिसने चश्मे वापस लाने मैं मदद की | मैं उन सबका शुक्रगुजार हूं जीस कहानी का अंत बड़ा ही सुखद व रोमांचित था| अब हम वापस अपने सफर पर रवाना हो गए लेकिन यह याद दिल को छू गई और अब मुझे बंदर और राहगीर अपने से लगने लगे |

कहानी के लेखक

विमल कुमार पंचाल । ।

।।युवा षडयंत्र।

।।युवा षडयंत्र।।

शहर में शोरगुल है।
हर आदमी अपने में मशगूल है ।।
इस तमन्नाओं की दुनिया में ।
चाहतों की दुनिया में ।
हर एक जिंदगी में चुभा रहा है दुखों के शूल है ।।
शहर में शोरगुल है ।
एक हंगामा फिर उठा ।
कुछ लाशें और गिरी।।
भीड़ में कौतूहल है ।
शहर में शोरगुल है ।।
हर शोर में एक कहानी है, हर दुख में एक जवानी है ।
बूढ़ों की राजनीति में जवानों की जान जानी है ।।
शहर में शोरगुल है।
भीड़ में कुचल जाने ।।
वाले बेरोजगारी की आग में जलने वाले ।
उपद्रवियों की गोली का निशाना होने वाले ।।
जवान ही तो है,
जिनका भविष्य जिंदगी की काल कोठरी में छूट गया है ।
जो स्वयं भविष्य लिख सकते हैं ।
उनका भविष्य राजनीतिज्ञ वह गुंडा तत्व लिख रहे हैं।
देश का वर्तमान यूं ही बर्बाद होता है ।।
सोचता हूं हम किस कगार पर आ खड़े हैं ।
जहां रिश्तो के मूल्य होते हैं ।
जवानिया पश्चिम रस्मों में डूबी हैं।।
ऐसे कोतुहल में ,कौन सुदर्शन चक्र उठाएगा ।
कौन गति देगा पश्चिम से पूर्व की ओर
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